चतरा विमान हादसा: जिस जिंदगी को बचाने के लिए दांव पर लगा दी पूंजी, वही मौत के सफर में तब्दील हुई
आग की लपटों से बच निकले थे, पर किस्मत को कुछ और मंजूर था
चंदवा/चतरा: नियति जब क्रूर होती है, तो संभलने का मौका भी नहीं देती। चतरा में हुए विमान हादसे की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, चंदवा निवासी संजय प्रसाद की कहानी सुनकर हर आंख नम है। यह केवल एक विमान दुर्घटना नहीं, बल्कि एक परिवार के संघर्ष, उम्मीद और फिर सब कुछ खत्म हो जाने की वो दास्तां है जिसने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया है।
आग की लपटों से बच निकले थे, पर किस्मत को कुछ और मंजूर था
कहानी की शुरुआत कुछ दिन पहले हुई जब संजय प्रसाद के होटल में शॉर्ट सर्किट की वजह से भीषण आग लग गई। इस हादसे में संजय का रोजगार (होटल) तो खाक हुआ ही, वे खुद भी 65 प्रतिशत तक झुलस गए थे। स्थानीय स्तर पर प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए बेहतर इलाज की जरूरत थी।
7.5 लाख का कर्ज और आखिरी उम्मीद: एयर एम्बुलेंस
संजय की हालत इतनी नाजुक थी कि उन्हें सड़क मार्ग से ले जाना संभव नहीं था। अपनों को बचाने की जद्दोजहद में परिवार ने:
रिश्तेदारों और परिचितों से 7.5 लाख रुपये उधार लिए।
दिल्ली के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भारी-भरकम राशि जुटाई।
महंगे खर्च पर एयर एम्बुलेंस बुक की ताकि वक्त रहते उन्हें बेहतर इलाज मिल सके।
टीवी पर देखी अपनों की मौत की खबर
संजय के बड़े भाई विजय शॉ उन्हें रांची एयरपोर्ट पर छोड़कर घर लौटे ही थे कि टीवी स्क्रीन पर चतरा विमान हादसे की खबर फ्लैश होने लगी। विजय ने रुंधे गले से बताया, "हमें क्या पता था कि जिस भाई को हम जिंदगी की उम्मीद देकर विदा कर रहे हैं, वह कभी वापस नहीं आएगा। पल भर में सब कुछ खत्म हो गया।"
त्रासदी का दूसरा पहलू: इस हादसे ने न केवल संजय को छीना, बल्कि उनकी पत्नी अर्चना की भी मौत हो गई। पीछे छूट गए हैं दो मासूम बच्चे, जिनके सिर से मां-बाप का साया हमेशा के लिए उठ गया है।
"अगर रांची में बेहतर इलाज होता तो..."
स्थानीय निवासी प्रकाश कुमार उर्फ ददन और अन्य लोगों ने इस घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है। शोकाकुल परिवार का कहना है कि अगर रांची में ही विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होतीं, तो उन्हें 7.5 लाख का कर्ज लेकर दिल्ली जाने की जोखिम भरी यात्रा नहीं करनी पड़ती।