पैसे नहीं थे तो खुद बना वकील: नीट छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की मिसाल

मध्य प्रदेश के अथर्व चतुर्वेदी ने वकीलों की भारी फीस के बजाय खुद की पैरवी करना चुना। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का इस्तेमाल कर दिया MBBS में प्रवेश का आदेश।

Feb 16, 2026 - 19:12
Feb 16, 2026 - 19:20
 0
पैसे नहीं थे तो खुद बना वकील: नीट छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की मिसाल

नई दिल्ली/जबलपुर:

जबलपुर के एक नीट (NEET) अभ्यर्थी अथर्व चतुर्वेदी ने वह कर दिखाया जो कानून के दिग्गजों के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है। वकील करने के लिए पर्याप्त पैसे न होने के बावजूद, अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट में 'पेटिशनर-इन-पर्सन' (स्वयं याचिकाकर्ता) के रूप में बहस की और मात्र 10 मिनट की दलीलों से जजों का दिल जीत लिया।

क्या था पूरा मामला?

अथर्व चतुर्वेदी एक मेधावी छात्र हैं जिन्होंने दो बार NEET परीक्षा पास की और 530 अंक हासिल किए। वे EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) श्रेणी से आते हैं। विवाद तब शुरू हुआ जब मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में तो EWS आरक्षण दिया, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में इसे लागू नहीं किया।

हाईकोर्ट का रुख: इससे पहले अथर्व ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी, लेकिन वहां उन्हें तत्काल राहत नहीं मिली। कोर्ट ने सरकार को नीति बनाने के लिए एक साल का समय दे दिया था, जिससे अथर्व का कीमती साल बर्बाद होने का खतरा था।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट रूम में क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान जब जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने अथर्व को बोलने का मौका दिया, तो उन्होंने कोर्ट से विनम्रतापूर्वक कहा, "मुझे अपनी बात रखने के लिए बस 10 मिनट दीजिए।"

अथर्व की दलील: उन्होंने तर्क दिया कि नीतिगत देरी या प्रशासनिक खामियों का खामियाजा एक मेधावी छात्र को क्यों भुगतना चाहिए? उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 15(6) और 16(6) का हवाला देते हुए निजी कॉलेजों में आरक्षण के अपने अधिकार की मांग की।

कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को फटकार लगाते हुए कहा कि यदि निजी कॉलेज आरक्षण नीति का पालन नहीं करते, तो उन्हें बंद कर देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों (अनुच्छेद 142) का उपयोग करते हुए अथर्व के पक्ष में फैसला सुनाया:

अथर्व को सत्र 2025-26 के लिए उनकी EWS रैंक के अनुसार एमबीबीएस में अस्थायी (Provisional) प्रवेश देने का आदेश दिया गया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी छात्र का भविष्य सरकारी देरी के कारण प्रभावित नहीं होना चाहिए।

राज्य सरकार को निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS कोटे के लिए जरूरी सीटें बढ़ाने और प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए।

दिलचस्प तथ्य: अथर्व के पिता खुद एक वकील हैं, लेकिन उन्होंने कभी सुप्रीम कोर्ट में पैरवी नहीं की थी। अथर्व ने खुद कानून की किताबों और इंटरनेट की मदद से अपनी याचिका तैयार की। उनकी दलीलों से प्रभावित होकर जजों ने यहां तक कह दिया कि उन्हें डॉक्टर के साथ-साथ एक अच्छा वकील बनने के बारे में भी सोचना चाहिए।