सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: "मुफ्त की योजनाओं से खाली हो रहा खजाना, आखिर कब तक चुकाएगा टैक्सपेयर?"

Feb 19, 2026 - 19:39
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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: "मुफ्त की योजनाओं से खाली हो रहा खजाना, आखिर कब तक चुकाएगा टैक्सपेयर?"

नई दिल्ली: देश में चुनावों से पहले राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली 'मुफ्त घोषणाओं' (Freebies) पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की और विकास बनाम लोकलुभावन योजनाओं के बीच संतुलन पर सवाल उठाए।

कर्ज के जाल में फंसे राज्य

अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि कई राज्य सरकारें पहले से ही भारी कर्ज और वित्तीय घाटे में डूबी हुई हैं। इसके बावजूद, वोट बैंक की राजनीति के लिए मुफ्त बिजली, पानी और सीधे कैश ट्रांसफर जैसी योजनाएं जारी हैं।

मुख्य न्यायाधीश का मुख्य सवाल: "अगर सरकारें सब कुछ मुफ्त बांटती रहेंगी, तो अंततः इसका खर्च कौन उठाएगा? जाहिर है, इसका पूरा बोझ उन ईमानदार करदाताओं (Taxpayers) पर पड़ता है जो देश के निर्माण में योगदान देते हैं।"

विकास बनाम मुफ्तखोरी: एक बड़ा संकट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) और अनियंत्रित मुफ्तखोरी के बीच एक महीन रेखा होती है। अदालत ने निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित किया:

बुनियादी ढांचे की अनदेखी: यदि सारा पैसा मुफ्त अनाज, साइकिल और कैश ट्रांसफर में खर्च हो जाएगा, तो सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों और उद्योगों जैसे बुनियादी विकास कार्यों के लिए फंड कहां से आएगा?

रोजगार बनाम दान: कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकारों को लोगों को 'मुफ्त चीजें' देने के बजाय 'रोजगार के अवसर' पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ताकि नागरिक आत्मनिर्भर बन सकें।

आर्थिक स्थिरता: अनियंत्रित खर्च राज्यों को दिवालियेपन की ओर धकेल सकता है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।