पंचायत भवन बना महज शोपीस, बिना इंटरनेट-कंप्यूटर कैसे पूरा होगा डिजिटल गांव का सपना?
फाजिलनगर के बेइली-बकुलहर ग्रामसभा के बकुलहर कला में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा सवाल
कुशीनगर। ब्यूरो न्यूज लाइव 31
सरकार गांवों को डिजिटल सुविधाओं से जोड़ने और ग्रामीणों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर से मुक्ति दिलाने का दावा कर रही है। ग्राम पंचायत भवनों को ग्राम सचिवालय के रूप में विकसित कर ग्रामीणों को विभिन्न सरकारी सेवाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है। शासन की व्यवस्था में ग्राम सचिवालयों में कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने तथा पंचायत सहायक के माध्यम से ग्रामीणों को आवश्यक सेवाएं दिलाने का प्रावधान भी है।
लेकिन फाजिलनगर क्षेत्र की बेइली-बकुलहर ग्रामसभा के बकुलहर कला स्थित पंचायत भवन की तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार पंचायत भवन में न तो इंटरनेट की फाइबर केबल पहुंची है, न कंप्यूटर की समुचित व्यवस्था दिखाई देती है और न ही डिजिटल सेवाओं के संचालन के लिए आवश्यक संसाधन मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस पंचायत भवन को ग्रामीणों के लिए डिजिटल सुविधा का केंद्र बनाने की बात कही जा रही है, वह जब मूलभूत डिजिटल संसाधनों से ही वंचित है तो ग्रामीणों के ऑनलाइन कार्य आखिर कैसे होंगे?
बिना इंटरनेट और कंप्यूटर के डिजिटल पंचायत कैसे?
आज आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र, खतौनी, वरासत, किसान संबंधी कार्य और अन्य तमाम सरकारी सेवाओं का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन प्रक्रिया से जुड़ा है। ऐसे में केवल एक भवन खड़ा कर देने से ग्राम सचिवालय डिजिटल नहीं हो जाता।
कंप्यूटर नहीं, इंटरनेट नहीं और ऑपरेटर की प्रभावी व्यवस्था नहीं—तो फिर ऑनलाइन सेवाओं का संचालन किस माध्यम से होगा?
सरकार की मंशा है कि ग्रामीणों को छोटी-छोटी सरकारी सेवाओं के लिए ब्लॉक, तहसील और जिला मुख्यालय के चक्कर न लगाने पड़ें। लेकिन यदि पंचायत भवन में ही डिजिटल आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं तो यह उद्देश्य कागजों से निकलकर जमीन तक कैसे पहुंचेगा?
अब लेखपाल भी बैठेंगे, लेकिन व्यवस्था कहां है?
ग्राम सचिवालयों में लेखपालों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए 1 जुलाई 2026 से व्यवस्था लागू किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसके पीछे उद्देश्य यही बताया गया है कि ग्रामीणों को राजस्व संबंधी सेवाएं गांव के स्तर पर आसानी से उपलब्ध हों।
लेकिन बकुलहर कला का सवाल इससे भी बड़ा है—
जब पंचायत भवन में इंटरनेट कनेक्टिविटी और कंप्यूटर जैसी बुनियादी डिजिटल व्यवस्था ही नहीं है, तो लेखपाल के बैठने के बाद ग्रामीणों के ऑनलाइन कार्य किस व्यवस्था से होंगे?
क्या केवल लेखपाल की उपस्थिति दर्ज करा देने से ग्राम सचिवालय प्रभावी हो जाएगा या इसके लिए जरूरी तकनीकी संसाधनों की भी व्यवस्था होगी?
भवन कई साल पहले बना, अब व्यवस्था कौन करेगा?
ग्रामीणों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि पंचायत भवन के निर्माण पर सरकारी धन खर्च होने के बाद यदि उसमें आवश्यक संसाधन ही उपलब्ध नहीं कराए गए तो उसका वास्तविक उपयोग क्या है?
क्या पंचायत भवन सिर्फ एक सरकारी इमारत बनकर रह जाएगा या वास्तव में ग्रामीणों का ‘ग्राम सचिवालय’ बनेगा?
ग्रामीणों को अब जवाब चाहिए—
फाइबर इंटरनेट कब आएगा?
कंप्यूटर कब लगेगा?
ऑपरेटर/पंचायत सहायक की नियमित व्यवस्था कब होगी?
लेखपाल की नियमित उपस्थिति कैसे सुनिश्चित होगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—ग्रामीणों के काम वास्तव में पंचायत भवन से कब होंगे?
कागज पर डिजिटल पंचायत या धरातल पर सुविधा?
सरकार डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस की दिशा में लगातार आगे बढ़ने की बात कर रही है। ऐसे में गांव के स्तर पर बनी पंचायत व्यवस्था का तकनीकी रूप से सक्षम होना जरूरी है।
बकुलहर कला का पंचायत भवन अब एक सीधा सवाल पूछ रहा है—क्या डिजिटल गांव केवल सरकारी आदेशों और कागजी रिपोर्टों में है, या उसकी सुविधा ग्रामीणों को वास्तव में जमीन पर भी मिलेगी?
अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी मौके पर निरीक्षण कर पंचायत भवन में इंटरनेट कनेक्टिविटी, कंप्यूटर, पंचायत सहायक/ऑपरेटर और लेखपाल की व्यवस्था की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें।
क्योंकि सिर्फ भवन बन जाने से ग्राम सचिवालय नहीं बनता—उसे चलाने के लिए व्यवस्था, संसाधन और जवाबदेही भी चाहिए।
ग्रामीणों की नजर अब अधिकारियों के जवाब पर है।